जय माता दी Once again

Pardeep Dhounchak

जाट देवता ने कहा है : घुमक्कड़ी किस्मत से मिलती है
जनवरी 2019 की बात है । 26 जनवरी को शनिवार था और रविवार की मेरी छुट्टी होती है 22 जनवरी को बीवी भी बच्चों समेत कुछ दिन के लिए अपने मायके पहुंच गई। अब मुझ जैसे निजी कर्मचारी को ऐसे ही मौकों की तलाश रहती है । ऑफिस के दोस्तों के साथ कहीं घूमने जाने का प्लान बनाया। पहले नम्बर पर रेणुका जी झील, दूसरे नम्बर पर चोपतातुंगनाथ और तीसरे नम्बर पर पराशर झील मेरी लिस्ट में था और ये तीनों जगह बाइक से ही आना जाना था। लेकिन जब पता चला कि भयंकर सर्दी के कारण रास्ते में बहुतायत कोहरा मिल सकता है तो आधे मित्रगण पीछे हट गए। मुझे भी इतनी सर्दी में बाइक यात्रा सही नहीं लगी और तुरंत सब कुछ हटा के माता वैष्णो देवी के दरबार जाना तय हुआ।
हरियाणा में एक कहावत है कि "घणी स्याणी दो बर पोवै फेर भी भूखी सोवै"। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। कैसे हुआ वो आगे समझ आएगा।
ऑफिस से हम पांच जनों ने जाना था मैं, सुमित, अजय, कुलदीप और आदित्य ।
किसी भी ट्रेन में आरक्षण के लिए सीट खाली नहीं थी और बस में किराया ज्यादा था । चूंकि अपने ऑफिस के मित्रों में सबसे ज्यादा मैं ही वैष्णो देवी की यात्रा कर चुका हूँ तो सारी प्लानिंग की जिम्मेदारी मेरी ही थी । सबको बताया गया कि शुक्रवार 25 जनवरी को रात 10:04 बजे पानीपत पहुंचने वाली ट्रेन उत्तर संपर्क क्रांति से चलेंगे । लेकिन वो ऊपर लिखी हुई कहावत भी तो चरितार्थ होनी थी और उसी के वसीभूत होकर प्लान में थोड़ा बदलाव किया गया । उत्तर संपर्क क्रांति ट्रेन शाम 8:50 बजे नई दिल्ली से ही बन के चलती है तो मैंने सोचा कि क्यों ना नई दिल्ली से ही ट्रेन पकड़ी जाए ताकि आराम से सीट मिल जाए। मैंने बाकि सब को भी ये प्लान बताया और फिर मैं और सुमित ऑफिस से शुक्रवार को आधे दिन की छुट्टी लेकर दोपहर को पानीपत से दिल्लीजाने वाली पैसेंजर ट्रेन में सवार हो लिए ।
अजय समालखा में रहता है और उन दिनों उसकी रात्रिकालीन ड्यूटीलगी हुई थी । मैंने अजय को बता दिया कि दिन में ही दिल्ली चलेंगे क्योंकि वहां से तो सीट भी मिल जाएगी तो समालखा से अजय भी हमारे साथ ट्रेन में सवार हो लिया रुकती, पिटती, हुई ट्रेन शाम 6:50 बजे 1 घंटे की देरी से पुरानी दिल्ली पहुंची । ट्रेन से उतरते ही मैंने अजय और सुमित को बोला कि कुछ मत पूछना बस मेरे पीछे पीछे भाग चलो। थोड़ी ही देर में हम चांदनी चौक मेट्रो स्टेशन से मेट्रो ट्रेन में सवार होकर नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर पहुंच गए । टिकट काउंटर पर लम्बी-लम्बी लाइन लगी हुई थी । मैंने अजय और सुमित को प्लेटफार्म पर भेज दिया कि अगर ट्रेनप्लेटफार्म पर लग जाए तो सीट ले लेना और
खुद लाइन में लग गया ।आधे घंटे तक भी जब लाइन आगे नहीं सरकी तो मैंने
सोचा कि यहाँ तो टिकट मिलने तक ट्रेन ही निकल जायेगी इसीलिए
कुलदीप को फ़ोन करके बोल दिया कि हमारी टिकट भी ले लेना पानीपत से और मैं भी प्लेटफार्म पर पहुंच गया । तब तक ट्रेन तो नहीं लगी थी लेकिन हमें भूख जोरों की लग चुकी थी । अजय घर से आलू के बड़े बड़े 12 परांठे लाया था

पहले तो परांठों का खत्म किया गया । थोड़ी देर बाद हमारे सामने वाले प्लेटफार्म पर एक ट्रेन आकर खड़ी हुई । पता नहीं क्या मामला था क्योंकि उस ट्रेन के आरक्षित डिब्बे में चढ़ने से पहले एक टी टी सबका टिकट देखकर ही अंदर घुसने दे रहा था । अब हमे भी समस्या हो गयी कि अगर यहीं पे टिकट मांग ली तो कहीं नहीं जा पाएंगे । मैं दोबारा से भागा भागा टिकट काउंटर पे पहुंचा । 20 मिनट में टिकट मिल गयी इस दौरान अजय का फोन आया कि ट्रेन प्लेटफार्म पर लग चुकी है और अनारक्षित डिब्बे में कोई भी सीट खाली नहीं है । टिकट लेकर मैं भी प्लेटफार्म पर पहुंचा और बड़ी मुश्किल से डिब्बे में घुस पाया । डिब्बे में चढ़ते ही मेरी हंसी छूट गयी और वो कहावत याद आ गयी कि
"घणी स्याणी दो बर पोवै फेर भी भूखी सोवै"
अजय और सुमित ने बताया कि ट्रेन प्लेटफार्म पर लगने से पहले ही भर चुकी थी । जिस डिब्बे में हम चढ़े थे उसमे लगभग 20 से 30
सरदार सीटों पर दो-दो लेटे हुए थे और किसी और को बैठने नहीं दे रहे थे । तभी एक बंदा ट्रेन में चढ़ा और सीट को लेकर सरदारों से बहस करने लगा ।बात बढ़ते हुए मारपीट तक पहुँच गयी और वो बंदा
सरदारों को पानीपत स्टेशन पर देख लेने की धमकी देते हुए नीचे उतर गया ।

हम तीनो की हालत ऐसी थी कि हम दरवाजे के पास खड़े हुए थे और दरवाजा अंदर से बंद कर दिया गया था । आधे घंटे की देरी से ट्रेन चली और ट्रेन चलने तक लगातार बाहर से दरवाजा खुलवाने के लिए लोगों की भीड़ चिल्ला रही थी लेकिन डिब्बे में कहीं पैर तक
रखने की जगह नहीं थी । सोनीपत के आसपास मैंने कुलदीप को फोन किया तो
उसने बताया कि वो पानीपत स्टेशन पर पहुँचने वाला है । मैंने उसको बोला कि हमने अपनी टिकट ले ली है तूँ अपनी टिकट ले लेना और दो बोतल पानी भी ले आना । फिर आदित्य को फोन किया तो उसने कहा कि मेरे पैर में कुछ दिक्कत है तो मैं नहीं आ पाउँगा । आदित्य के ना आने का बहुत दुःख हुआ क्योंकि उसके पास मोबाइल चार्ज करने के
लिए पावर बैंक था और हम उसी पॉवर बैंक के भरोसे थे । इधर जैसे जैसे ट्रेन पानीपत के नजदीक पहुँच रही थी सरदारों में खुसर पुसर शुरू हो
गयी कि कहीं सच में ही उस बन्दे ने पानीपत स्टेशन पर गुंडों को ना बुला
रखा हो । 10:30 बजे ट्रेन पानीपत पहुंची । ट्रेन रुकते ही प्लेटफार्म पर खड़े यात्री ट्रेन में चढ़ने के
लिए हो हल्ला करने लगे और इधर ट्रेन में बैठे हुए
सरदारों के हलक सूखे जा रहे थे । खैर हलक तो हमारे भी सूख रहे थे प्यास के मारे क्योंकि ट्रेन का डिब्बा भयानक तरीके से भरा हुआ था और उमस के कारण सर्दी में भी प्यास से बुरा हाल था । पानीपत से भी 10-12 बन्दे हमारे डिब्बे में घुस लिए और सब वैष्णो देवी जाने वाले ।उन्होंने शोर शराबा शुरू किया और इधर सरदारों ने भी पैर सिकोड़ लिए और उन के पास कुछ सवारियों को बैठने की जगह मिल गयी कुलदीप को ट्रेन में चढ़ने की जगह नहीं मिली और वो पानीपत ही रह गया । पानीपत से ट्रेन चलने के बाद सरदारों ने भी राहत की साँस ली लेकिन हमारी साँस सूखी जा रही थी
पानी भी कुलदीप के साथ पानीपत ही रह गया । अम्बाला तक पहुँचते-पहुँचते हम बिल्कुल पस्त हो गए । कभी मैं नीचे बैठूं कभी सुमित और कभी अजय ।12:00 बजे रात में ट्रेन अम्बाला पहुँच गयी । हमने सोचा कि किसी आरक्षित डिब्बे में चढ़ जाते हैं और टी टी को अतिरिक्त किराया देकर एक-आध सीट ले लेंगे लेकिन आरक्षित डिब्बे में भी भीड़ का जबरदस्त आलम था । हमारी दोबारा ट्रेन में चढ़ने की हिम्मत नहीं हुई और धीरे-धीरे स्टेशन से बाहर निकल लिए । ऐसा नहीं था कि हमने पहली बार ट्रेन के अनारक्षित डिब्बे में यात्रा की हो लेकिन इतनी भीड़ सिर्फ दूसरी बार देखने को मिली । अम्बाला रेलवे स्टेशन के बाहर सामने ही रोड पार करके बसस्टैंड है । हम बसस्टैंड पर पहुंचे और कटरा जाने वाली बस का पता किया । एक बस के कंडक्टर ने बताया कि जम्मू की तरफ जानेवाली बस इस समय बाहर रोड पे ही मिलेंगी । बहुत ज्यादा ठण्ड थी और हम स्टेशन और बसस्टैंड के बीच रोड पर खड़े होकर बस की प्रतीक्षा करने लगे । आसपास खूब चहल-पहल थी । साथ ही एक चाय का खोखा भी था । हमने सोचा कि जब तक बस आती है चाय पी लेते हैं । जैसे ही हम चाय के खोखे पे पहुंचे तो जम्मू जाने वाली एक बस आ गयी आसपास खड़ी सवारियां दौड़ के बस में चढ़ गयी । हम भी भाग कर बस के पास आये । वो प्राइवेट बस थी और किराया भी ज्यादा था । हम उसमें नहीं चढ़े और दोबारा चाय वाले के पास पहुंचे । तभी एक और बस आ गयी । हम फिर से भाग के बस के पास पहुंचे तो पता चला कि पठानकोट तक ही जाएगी । कोहरा होने के कारण दूर से बस का पता नहीं चल रहा था कि कहाँ की है । अब मैंने अजय को चाय लेने भेज दिया और मैं और सुमित आने वाली हर बस को देखने लगे ।
थोड़ी ही देर में हम तीनों चाय की चुस्कियां लेते हुए बस का इंतज़ार करने लगे । लेकिन सब पंजाब जाने वाली बस आ रही थी । मैंने बोला कि एक बजे तक बस आ गयी तो ठीक नहीं तो वापस घर चलते हैं । ठीक 1:00 बजे दूर से हरियाणा रोडवेज आती हुई दिखाई दी। थोड़ा और नजदीक आयी तो सामने लगा हुआ बोर्ड पढ़ा "दिल्ली कटरा दिल्ली", हमारी ख़ुशी का ठिकाना ना रहा । बस के रुकते ही चढ़ लिए और तीनों को सीट भी मिल गयी । सुबह 5:00 बजे आँख खुली तो देखा बस पठानकोट से आगे एक ढाबे पर रुक चुकी है । थोड़ी देर बाद बस फिर से चली। हरियाणा रोडवेज ने अपनी ख्याति के अनुरूप प्रदर्शन किया और उत्तर संपर्क क्रांति के टाइम से 10 मिनट पहले कटरा पहुंचा दिया । वैष्णो देवी के दर्शनों के लिए आवश्यक यात्रा पर्ची को मैंने ऑनलाइन ही बुक करके उसका प्रिंट निकाल लिया था । ऑनलाइन यात्रा पर्ची की बुकिंग के लिए maavaishnodevi साइट पे पहले अपना अकाउंट बनाना पड़ता है । उसके बाद साइट पे दिए गए दिशानिर्देशों का पालन करते हुए यात्रा पर्ची बुक की जाती है ।

कटरा पहुँच कर हमने बसस्टैंड के पास एक होटल में एक घंटे के लिए एक कमरा लिया और एक घंटे बाद नहा-धोकर, मोबाइल चार्ज करके निकल पड़े। वैष्णो देवी के आसपास के पहाड़ बर्फ से लकदक थे । हमने बाण गंगा तक जाने के लिए एक ऑटो वाले से पूछा तो उसने बताया कि एक नया रास्ता भी बन चुका हैं ताराकोट से भवन तक पहुँचने के लिए

ताराकोट से पैदल चढाई शुरू करने से पहले हमने थोड़ी पेट पूजा की और फिर चल दिए । ये रास्ता हिमकोटी वाले रास्ते पे पहुंचाता है और बाणगंगा वाले रास्ते से लगभग 2 किलोमीटर ज्यादा
लम्बा है । इस रास्ते पे खच्चर नहीं चलते इसी वजह से बिल्कुल साफ सुथरा है । आसपासकी पहाड़ियों के शानदार नज़ारों से भरपूर है
लेकिन खाने पीने की दुकानें सीमित मात्रा में हैं और कुछ महंगी भी हैं इसीलिए अगर इस रास्ते से चढ़ाई करनी हो तो अपने साथ नाश्ते की व्यवस्था करके चलिए । पीने के पानी की कोई कमी नहीं है । शाम 5 बजे के करीब हम माता के भवन पहुंचे । भवन पर यात्रियों की काफी भीड़ थी और माता को अर्पण करने के लिए प्रसाद लेने वालों की लम्बी लाइन लगी हुई थी । मैं लाइन में लग गया और अजय और सुमित को सामान जमा करवाने के लिए लॉकर बुक करने भेज दिया
प्रसाद वितरण केंद्र की छत पर काफी बर्फ गिरी हुई थी ।
हम उस बर्फ को देख-देख कर बड़े खुश हो रहे थे।
पूरे 45 मिनट लगे प्रसाद मिलने में। जैसे ही हम अपना अनावश्यक सामान लॉकर में जमा करके माता के दर्शनों को चले
तभी लाउडस्पीकरपर घोषणा हुई कि 6 बजे माता के
भवन की सफाई और आरती होने तक प्रवेश बंद कर दिया जायेगा । हम भी जल्दी से दर्शनों के लिए लगी लाइन में प्रवेश कर गए । धीरे-धीरे मौसम ने करवट ली और आसमान से रुई केफोहे से गिरने लगे । पहली बार हम बर्फ़बारी लाइव देख रहे थे । लगभग 1 घंटे में हम माता के पिंडी रूप में दर्शन करके गुफा से बाहर आ गए । बर्फ़बारी होने के बाद ठण्ड बढ़ गयी और नंगे पैर चलते हुए ऐसा लग रहा था कि मानों पैरों के तलवे गल गए हों । लॉकर से सामान वापिस लेने के बाद एक भोजनालय पर खाना खाया और भैरों बाबा के दर्शनों के लिए सीढ़ियों से चढ़ लिए । हमने उड़नखटोले का भी पता किया लेकिन किसी कारणवश उस समय उड़नखटोले को बंद किया हुआ था । भैरों मंदिर तक पूरे रास्ते पर काफी बर्फ थी । भैरों बाबा के दर्शनोपरांत हम सांझी छत की ओर से नीचे उतरते हुए अर्धकुंवारी मंदिर के प्रांगण में कुछ देर रुके । काफी बार माँ वैष्णो देवी की यात्रा की है लेकिन अभी तक गर्भजून गुफा के अंदर से निकलने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ है ।धीरे-धीरे, कभी भागे-भागे हम रात को 2 बजे कटरा पहुँच गए । रात होने के बावजूद काफी दुकानें खुली हुई थी । हमने कुछ खरीददारी की और सोचा कि रेलवे स्टेशन पर चलते हैं और सुबह वाली ट्रेन से वापसी करेंगे लेकिन फिर वहां संभावित भीड़ के मद्देनजर हमने ट्रेन से वापसी का विचार त्याग दिया । कटरा में बसस्टैंड के पास चौक पे माता का जागरण चल रहा था । बसस्टैंड से पता चला कि सुबह 5 बजे चौंक से एक बस दिल्ली जाएगी । अभी 3 घंटे बाकी थे । जागरण के टेंट के पास एक बंद दुकान के सामने एक चायवाला खड़ा था । हम भी उस बंद दुकान के चबूतरे पर लेट गए और सामने चल रहे जागरण का आनंद लिया । पता नहीं कौन सा गायक था लेकिन बड़े ही सूफियाना अंदाज में भजन गा रहा था ।सुबह 5 बजे के करीब हमने माता के जागरण से गरमा गरम हलवे और काले चनों का प्रसाद ग्रहण किया । 5 बजे चौंक पे हरियाणा रोडवेज की बस आयी वो दिल्ली जा रही थी तो हम भी उसमे सवार हों लिए । शाम 4 बजे हम पानीपत पहुँच गए

जय माता दी

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पानीपत रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का इंतज़ार

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कटरा से दिखती माता के भवन के आसपास बर्फीली पहाड़ियां

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ताराकोट के रास्ते से यात्रा शुरू

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रास्ते के नज़ारे

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ताराकोट के रास्ते से दिखता कटरा शहर

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रास्ते के नज़ारे

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भैरों मंदिर से माता का भवन

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भैरों मंदिर से सांझी छत के रास्ते में बर्फ

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भैरों मंदिर से सांझी छत के रास्ते में बर्फ
 
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