Shyari old memories lane

abhishek.raj01

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*चार दोस्त....दो साइकिलें ... खाली जेब और पूरा शहर...*_
*हमारा एक खूबसूरत दौर ये भी था जिंदगी का...*_

*उस दौर में सोचा करते थे के हम कुछ बेहतर हासिल करेंगे ..*_
*अब समझ में आया कि उससे बेहतर कुछ था ही नहीं...*
 

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कुछ कमियाँ मुझमें थीं, कुछ कमियाँ लोगों में थीं

फ़र्क सिर्फ इतना सा था

वो गिनते रहे और हम नजरअंदाज करते रहे
 

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Shayari:

तारीफ़ की चाहत तो, नाकामों की फितरत होती हैं साहेब,
काबिलों के तो, दुश्मन भी कायल होते हैं..!!
 

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Shayari:

एक एक कर इतनी कमियां निकाली लोगों ने मुझमें..!!.
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कि अब बस "खुबियां" ही रह गयी हैं मुझमें..!!
 

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मुद्दतें गुजर गईं...... हिसाब नहीं किया,

न जाने किसके, कितने रह गए हैं हम.....!
 

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*देहरी, आंगन, धूप नदारद।*
*ताल, तलैया, कूप नदारद।*
*घूँघट वाला रूप नदारद।*
*डलिया,चलनी,सूप नदारद।*

आया दौर फ्लैट कल्चर का,
देहरी, आंगन, धूप नदारद।
हर छत पर पानी की टंकी,
ताल, तलैया, कूप नदारद।।
लाज-शरम चंपत आंखों से,
घूँघट वाला रूप नदारद।
पैकिंग वाले चावल, दालें,
डलिया,चलनी, सूप नदारद।।

बढ़ीं गाड़ियां, जगह कम पड़ी,
सड़कों के फुटपाथ नदारद।
*लोग हुए मतलबपरस्त सब,*
*मदद करें वे हाथ नदारद।।*
मोबाइल पर चैटिंग चालू,
यार-दोस्त का साथ नदारद।
बाथरूम, शौचालय घर में,
कुआं, पोखरा ताल नदारद।।

हरियाली का दर्शन दुर्लभ,
*कोयलिया की कूक नदारद।*
घर-घर जले गैस के चूल्हे,
चिमनी वाली फूंक नदारद।।
मिक्सी, लोहे की अलमारी,
*सिलबट्टा, संदूक नदारद।*
मोबाइल सबके हाथों में,
विरह, मिलन की हूक नदारद।।

बाग-बगीचे खेत बन गए,
जामुन, बरगद, रेड़ नदारद।
सेब, संतरा, चीकू बिकते
गूलर, पाकड़ पेड़ नदारद।।
ट्रैक्टर से हो रही जुताई,
जोत-जात में मेड़ नदारद।
रेडीमेड बिक रहा ब्लैंकेट,
पालों के घर भेड़ नदारद।।

लोग बढ़ गए, बढ़ा अतिक्रमण,
*जुगनू, जंगल, झाड़ नदारद।*
कमरे बिजली से रोशन हैं,
ताखा, दियना, टांड़ नदारद।।
चावल पकने लगा कुकर में,
*बटलोई का मांड़ नदारद।*
कौन चबाए चना-चबेना,
भड़भूजे का भाड़ नदारद।।

पक्के ईंटों वाले घर हैं,
छप्पर और खपरैल नदारद।
ट्रैक्टर से हो रही जुताई,
*दरवाजे से बैल नदारद।।*
बिछे खड़ंजे गली-गली में,
*धूल धूसरित गैल नदारद।*
चारे में भी मिला केमिकल,
गोबर से गुबरैल नदारद।।

शर्ट-पैंट का फैशन आया,
धोती और लंगोट नदारद।
खुले-खुले परिधान आ गए,
बंद गले का कोट नदारद।।
*आँचल और दुपट्टे गायब,*
*घूंघट वाली ओट नदारद।*
महंगाई का वह आलम है,
एक-पांच के नोट नदारद।।

लोकतंत्र अब भीड़तंत्र है,
जनता की पहचान नदारद।
कुर्सी पाना राजनीति है,
नेता से ईमान नदारद।।
गूगल विद्यादान कर रहा,
मास्टर का सम्मान नदारद।
********************
 

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*_शायद अब लौट न पाऊँ खुशियों के बाजार में_*
*_ग़मों ने ऊंची बोली लगाकर खरीद लिया है मुझे_*
 

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लक्ष्य कोई “ बड़ा ” नही . . .
हारा वही जो “ लड़ा ” नही ।
 

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#गुलज़ार साहब

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में
एक पुराना ख़त खोला अनजाने में

शाम के साए बालिश्तों से नापे हैं
चाँद ने कितनी देर लगा दी आने में

रात गुज़रते शायद थोड़ा वक़्त लगे
धूप उन्डेलो थोड़ी सी पैमाने में

जाने किस का ज़िक्र है इस अफ़्साने में
दर्द मज़े लेता है जो दोहराने में

दिल पर दस्तक देने कौन आ निकला है
किस की आहट सुनता हूँ वीराने में

हम इस मोड़ से उठ कर अगले मोड़ चले
उन को शायद उम्र लगेगी आने में....
 

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कोई चेहरा मिटा के
और आंख से हटा के
चंद छींटें उड़ा के जो गया
छपाक से पहचान ले गया
एक चेहरा गिरा
जैसे मोहरा गिरा
जैसे धूप को ग्रहण लग गया
छपाक से पहचान ले गया

ना चाह न चाहत कोई
ना कोई ऐसा वादा है
हा

ना चाह न चाहत कोई
ना कोई ऐसा वादा है
हाथ में अंधेरा
और आंख में इरादा

कोई चेहरा मिटा के
और आंख से हटा के
हिन्दी ट्रैक्स डॉट इन
चंद छींटें उड़ा के जो गया
छपाक से पहचान ले गया

एक चेहरा गिरा
जैसे मोहरा गिरा
जैसे धूप को ग्रहण लग गया
छपाक से पहचान ले गया

बेमानी सा जुनून था
बिन आग के धुआं
बेमानी सा जुनून था
बिन आग के धुआं
ना होश ना ख्याल
सोच अंधा कौन

कोई चेहरा मिटा के
और आंख से हटा के
चंद छींटें उड़ा के जो गया
छपाक से पहचान ले गया

एक चेहरा गिरा
जैसे मोहरा गिरा
जैसे धूप को ग्रहण लग गया
छपाक से पहचान ले गया

आरज़ू थी शौक थे
वो सारे हट गए
कितने सारे जीने के तागे कट गए
आरज़ू थी शौक थे
वो सारे हट गए
कितने सारे जीने के तागे कट गए

सब झुलस गया

कोई चेहरा मिटा के

एक चेहरा गिरा
जैसे मोहरा गिरा
जैसे धूप को ग्रहण लग गया
छपाक से पहचान ले गया
छपाक से पहचान ले गया

पहचान ले गया
पहचान ले गया.....
 
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