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पुलिसकर्मियों के खाने का बिल भरने के बाद फैमिली ने छोड़ा ये भावुक मैसेज, हुआ वायरल
Moradabad News in Hindi



पुलिसकर्मियों के खाने का बिल भरने के बाद फैमिली ने छोड़ा ये भावुक मैसेज, हुआ वायरल


पुलिसकर्मी ने लिखा है कि उस फैमिली से तो नहीं मिल पाए पर जब हम लोग अपनी फोटो ले रहे थे तो उस परिवार के एक सदस्य की भी फोटो उसमें आ गई थी, जो अपलोड की है. (Facebook)


मुरादाबाद (Moradabad) में पुलिसकर्मियों ने खुद अपनी कहानी बयान की है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है. आईपीएस अफसर नवनीत सिकेरा ने भी पुलिसकर्मियों की इस कहानी को फेसबुक पर पोस्ट किया है.



लखनऊ. नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर पिछले दिनों हुए प्रदर्शनों के दौरान एक अनूठी तस्वीर मुरादाबाद (Moradabad) में देखने को मिली. मुरादाबाद पुलिस के तीन दरोगाओं को एक रेस्टोरेंट में एक परिवार से ऐसा सम्मान मिला कि वे भावुक हो गए. उन्होंने खुद अपनी कहानी बयान की है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो गई है. आईपीएस अफसर नवनीत सिकेरा ने भी पुलिसकर्मियों की इस कहानी को फेसबुक पर पोस्ट किया है.

पोस्ट कुछ इस प्रकार है-

दिनांक:
21/12/2019
समय: लगभग 5 बजे
स्थान: पीली कोठी, सिविल लाइन्स (मुरादाबाद)


'CAA' के प्रदर्शनों के बीच मुरादाबाद शहर की शान्ति व्यवस्था न भंग होने पाए, इसके लिए हम सभी पुलिसवाले सुबह से ही हर चौराहे पर मुस्तैद थे. सुबह से लगातार ड्यूटी करते-करते धीरे-धीरे दिन ढलने लगा. शाम होते-होते मुझे और मेरे साथियों को थोड़ी सी भूख भी लग आई थी तो मैं सुशील सिंह राठौर और मेरे दो साथी (SI गौरव शुक्ल व SI विजय पाण्डेय) ड्यूटी प्वाइंट के सामने एक रेस्टोरेंट में गए और भूख के हिसाब के थोड़ा हल्का-फुल्का खाना ऑर्डर कर दिया.

वहीं हमारे पास की टेबल पर एक फैमिली भी बैठी हुई थी. हमारा आर्डर किया हुआ खाना आया और मैं अपने साथियों के साथ खाने लगा. इसी बीच हमारे बगल वाली टेबल पर बैठी हुई फैमिली अपना खाना ख़त्म करके बिल देकर चली गई और हमलोगों ने उन पर ध्यान भी नहीं दिया और न ही उनसे कोई हाय-हैलो हुई.

हम लोगों ने अपना खाना फिनिश किया और वेटर से बिल लाने को कहा. वेटर जब बिल लेने गया तो उधर से उसके साथ रेस्टोरेंट का मैनेजर खुद चलकर आया और हम लोगों से बोला, "सर! आपका बिल पेमेंट कर दिया गया है।" ये सुनकर हम लोगों को बड़ा आश्चर्य हुआ, हमने बोला, "भाई अभी हमलोगों ने पेमेंट किया ही नहीं है तो कैसे हो गया!?" साथ के मित्र गौरव शुक्ल और विजय पांडेय ने नाराजगी मिश्रित भाव से मैनेजर से बोला, "ऐसा कैसे? कोई भी अनजान हमारा पेमेंट देकर चला गया, आपको हमसे तो पूछना चाहिए था."



तो मैनेजर बोला, "सर! आपके पास में जो फैमिली बैठी थी उन्होंने आपका बिल पेमेंट कर दिया है और साथ में आपके लिए एक मैसेज छोड़ा है कि जब ये लोग हमारी सुरक्षा के लिए अपना घर परिवार छोड़ कर दिन-रात हमारे लिए खड़े रहते हैं तो इनके प्रति भी हमारा कुछ कर्तव्य बनता है."

ये सुनकर पूरे शरीर के रोंगटे खड़े हो गए और मन मे अजीब सी भावनाएं हिलोर मारने लगीं. यार! किसी अजनबी से आज पहली बार इतना सम्मान मिला. हम लोग तुरंत भागकर रेस्टोरेंट के बाहर आए की शायद वो फैमिली हमें मिल जाए और हम उनके इस प्रेम के लिए धन्यवाद दे सकें. पर अफसोस! वो फैमिली जा चुकी थी और उनसे हम मिल भी न सके.

पुलिस के प्रति जनता के इसी विश्वास और प्रेम की वजह से हम पुलिसवाले पूस की सर्द रातों में, जेठ की तपती दोपहरी में और मूसलाधार बारिश में भी उनकी सुरक्षा में अपना सब कुछ छोड़कर सदैव तत्पर रहते हैं. उस फैमिली से तो नहीं मिल पाए पर जब हम लोग अपनी फोटो ले रहे थे तो उस परिवार के एक सदस्य की भी फोटो उसमें आ गई थी, जो अपलोड की है.



 

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कमजोरी एवं थकावट दूर करने के घरेलू उपचार | Fitness Funda Tips
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•Dec 11, 2019



Fitness Funda Tips
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सुबह होने वाली कमजोरी से छुटकारा पाने का उपाय | Fitness Funda Tips |

Home Remedies to get rid of morning weakness :
सुबह उठते समय ऐसा महसूस होता है की आपका शरीर टूट रहा है? क्या आपका एनर्जी लेवल भी सुबह उठते समय कम रहता है? क्या सुबह उठने के फ्रैश और ताजगी महसूस होने की जगह आपको आलस महसूस होता है? यदि हाँ तो इसके बहुत से कारण हो सकते हैं। जैसे की खान पान में लापरवाही के कारण शरीर में कमजोरी व् थकान होना, नींद की कमी के कारण, अनियमित दिनचर्या होने की वजह से, शरीर में पोषक तत्वों की कमी होने के कारण, या फिर किसी शारीरिक समस्या का संकेत होना आदि ।
आपको शरीर में दिखने वाले इस लक्षण को बिल्कुल भी इग्नोर नहीं करना चाहिए, क्योंकि आप खुद ही सोचिए की यदि सुबह उठते समय आपको अच्छा महसूस नहीं होता है। तो इसके कारण पूरा दिन चिड़चिड़ापन और गुस्सा आना आम बात होती है। साथ ही इसके कारण आपका किसी काम में ही मन नहीं लगता है। लेकिन यह कोई ऐसी परेशानी नहीं है की जिसका कोई इलाज न हो बल्कि आप ही इसका इलाज कर सकते हैं, तो आइये सुबह की शुरुआत को बेहतर बनाने और आपकी इस समस्या का हल निकालने के लिए वीडियो को जानते हैं।
सुबह होने वाली कमजोरी से छुटकारा पाने का उपाय :--

खाली पेट पीएं पानी | Drink water on an empty stomach

ग्रीन टी पीएं | Drink green tea

व्यायाम करें | Do exercise

जूस पीएं | Drink juice

नींद ले भरपूर | sleep better in night

आहार का रखें ध्यान | Take care of diet
 

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dedicated to Poet @Alpha

मूल पाठ
यहाँ हम हिमालय के एक अंचल के बारे में एक पाठ पढ़ेंगे।
वह अंचल है-कौसानी।
आइए,एक बार इस के मूल पाठ को पढ़ जाते हंै।
ठेले पर हिमालय

ठेले पर हिमालय
’-

खासा दिलचस्प शीर्षक है न ! और यकीन कीजिए इसे बिल्कुल ढँूढ़ना नहीं पड़ा।
बैठे-बिठाए मिल गया। अभी कल की बात है, एक पान की दुकान पर मैं अपने एकगुरुजन उपन्यासकार मित्रा के साथ खड़ा था कि ठेले पर बर्फ की सिलें लादे हुए बर्फ वालाआया।
ठंडे, चिकने चमकते बर्फ से भाप उड़ रही थी। मेरे मित्रा का जन्म-स्थान अल्मोड़ा है,वे क्षण-भर उस बर्फ को देखते रहे, उठती हुई भाप में खोए रहे और खोए-खोए से ही बोले,‘यही बर्फ तो हिमालय की शोभा है।’वे हँसे भी, पर मुझे लगा कि वह बर्फ कहीं उनके मन को खरोंच गई और ईमान की बात यह है कि जिसने 50 मील दूर से भी बादलों के बीच, नीले आकाश में हिमालय की शिखर-रेखाको चाँद-तारों से बात करते देखा है, चाँदनी में उजली बर्फ को धुँधले हल्के नीले जाल मंेदूधिया समुद्र की तरह मचलते और जगमगाते देखा है, उसके मन पर हिमालय की बर्फ एकऐसी खरोंच छोड़ जाती है, जो हर बार याद आने पर पिरा उठती है। मैं जानता हूँ, क्योंकिवह बर्फ मैंने भी देखी है।
सच तो यह है कि सिर्फ़ बर्फ़ को बहुत निकट से देख पाने के लिए ही हम लोग कौसानी गएथे। नैनीताल से रानीखेत और रानीखेत से मझकाली के भयानक मोड़ांे को पार करते हुए,कोसी। कोसी से एक सड़कअल्मोड़े चली जाती है, दूसरीकौसानी। कितना कष्टप्रद, कितनासूखा और कितना कुरूप है वहरास्ता ! पानी का कहीं नाम-निशाननहीं, सूखे-भूरे पहाड़, हरियाली कानाम नहीं। ढालों को काट करबनाए हुए टेढ़े-मेढ़े रास्ते पर अल्मोडे़ का एक नौसिखिया और लापरवाह ड्राइवर जिसने बस के तमाम मुसाफिरों की ऐसी हालत कर दीकि जब हम कोसी पहुँचे तो सभी के चेहरे पीले पड़ चुके थे।

कौसानी जाने वाले सिर्फ हम ही थे, वहाँ उतर गए। बस अल्मोड़े चली गई। सामने के एक टीन केशेड में काठ की बेंच पर बैठ कर हम वक्त काटते रहे। तबीयत सुस्त थी और मौसम में उमसथी। दो घंटे बाद दूसरी लाॅरी आकर रुकी और जब उस में से प्रसन्न-बदन शुक्ल जी को उतरते देखा तो हम लोगों की जान में जान आई। शुक्ल जी जैसा सफर का साथी पिछले जन्म के पुण्यों से ही मिलता है। उन्होंने हमें कौसानी जाने का उत्साह दिलाया था और खुद तो कभी उन के चेहरे पर थकान या सुस्ती दिखी ही नहीं, पर उन्हें देखते ही हमारी भी सारी थकान काफूर हो जाया करती थी।
कोसी से बस चली तो रास्ते का सारा दश्य बदल गया। सुडौल पत्थरों पर कल-कल करतीहुई कोसी, किनारे के छोटे-छोटे सुन्दर गाँव और हरे मखमली खेत। कितनी सुन्दर है सोमेश्वरकी घाटी ! हरी-भरी। एक के बाद एक बस स्टेशन पड़ते थे, छोटे-छोटे पहाड़ी डाकखाने, चायकी दूकानें और कभी-कभी कोसी या उस में गिरने वाले नदी-नालों पर बने हुए पुल। कहीं-कहींसड़क निर्जन चीड़ के जंगलों से गुजरती थी। टेढ़ी-मेढ़ी, ऊपर-नीचे रेंगती हुई कंकरीली पीठवाले अजगर-सी सड़क पर धीरे-धीरे बस चली जा रही थी। रास्ता सुहावना था और उसथकावट के बाद उस का सुहानापन हमें और भी तन्द्रालस बना रहा था। पर ज्यों-ज्यों बसआगे बढ़ रही थी, हमारे मन में एक अजीब-सी निराशा छाती जा रही थी-अब तो हम लोगकौसानी के नजदीक हैं।
कोसी से 18 मील चले आए, कौसानी के बारे सुना जाता था। आतेसमय मेरे एक सहयोगी ने कहा था कि कश्मीर के मुकाबले में उन्हंे कौसानी ने अधिक मोहहै, गांधी जी ने यहीं अनासक्ति योग लिखा था और कहा था कि स्विट्जरलैंड का आभास कौसानी में ही होता है। ये नदी, घाटी, खेत, गाँव, सुंदर हैं, किंतु इतनी प्रशंसा के योग्य तो नहीं ही है।
हम कभी-कभी अपना-अपना संशय शुक्ल जी से व्यक्त भी करने लगे और ज्यों-ज्यों कौसानी नजदीक आता गया त्यों-त्यों अधैर्य, फिर असंतोष और अंत में तो क्षोभ हमारे चेहरे पर झलक आया।
शुक्ल जी की क्या प्रतिक्रिया थी हमारी इन भावनाओं पर, यह स्पष्ट नहीं हो पाया क्योंकि वे बिलकुल चुप थे।
सहसा बस ने एक बहुत लंबा मोड़ लिया और ऊँचाई पर चढ़ने लगी।
सोमेश्वर की घाटी के उत्तर में जो ऊँची पर्वतमाला है,
उस पर, बिलकुल शिखर पर, कौसानी बसा हुआ है।
कौसानी से दूसरी ओर फिर ढाल शुरू हो जाती है।
कौसानी के अड्डे पर जा कर बस रुकी।
छोटा-सा बिल्कुल उजड़ा-सा गाँव और बर्फ़ का तो कहीं नाम-निशान नहीं।
बिल्कुल ठगे गए हम लोग।
कितना खिन्न था मैं।
अनखाते हुएबस से उतरा कि जहाँ था वहीं पत्थर की मूर्ति-सा स्तब्ध खड़ा रह गया।
कितना अपार सौंदर्य बिखरा था सामने की घाटी में।
इस कौसानी की पर्वतमाला ने अपने अंचल में यह जो कत्यूर कीरंग-बिरंगी घाटी छिपा रखी है, इस में किन्नर और यक्ष ही तो वास करते होंगे।
पचासों मील चैड़ी यह घाटी, हरे मखमली कालीनों जैेसे खेत, सुंदर गेरू की शिलाएँ काटकर बने हुए लाल-लाल रास्ते, जिनके किनारे सफेद-सफेद पत्थरों की कतार और इधर-उधर से आपस में उलझा जाने वाली बेले की लड़ियों-सी नदियाँ। मन में बेसाख्ता यही आया कि इन बेलों की लड़ियों को उठा कर कलाई में लपेट लूँ, आँखों से लगा लूँ। अकस्मात् हम एक दूसरे लोक में चले आए थे।
इतना सुकुमार, इतना सुंदर, इतना सजा हुआ और इतना निष्कलंक........ कि लगा इस धरती पर तो जूते उतार कर, पाँव पोंछकर आगे बढ़ना चाहिए।
धीरे-धीरे मेरी निगाहों ने इस घाटी को पार किया और जहाँ ये हरे खेत और नदियाँ और वन, क्षितिज के धुँधलेपन में नीले कोहरे में घुल जाते थे, वहाँ पर कुछ छोटे पर्वतों का आभास अनुभव किया, उसके बाद बादल थे और फिर कुछ नहीं। कुछ देर उन बादलों में निगाह भटकती रही कि अकस्मात् फिर एक हल्का-सा विस्मय का धक्का मन को लगा।
इन धीरे-धीरे खिसकतेहुए बादलों में यह कौन चीज है, जो अटल है।
यह छोटा-सा, बादलके टुकड़े-सा-और कैसा अजब रंग है इसका, न सफेद, न रूपहला,न हलका नीला....
पर तीनों का आभास देता हुआ।
यह है क्या? बर्फ तो नहीं है।
हाँ जी ! बर्फ नहीं है तो क्या है?
और अकस्मात् बिजली-सा यह विचार मन में कौंधा कि
इसी घाटी के पार वह नगाधिराज, पर्वतसम्राट हिमालय है, इन बादलों ने उसे ढाँक रखा है,
वैसे वह क्या सामने है,
उस का एक कोई छोटा-सा बाल-स्वभाव वाला शिखर बादलों की खिड़की से झाँक रहा है।
मैं हर्षातिरेक से चीख उठा, ‘‘बरफ़ ! वह देखो !’’
शुक्ल जी, सेन, सभी ने देखा, पर अकस्मात् वह फिर लुप्त हो गया। लगा, उसे बाल-शिखर जान किसी ने अंदर खींच लिया।
खिड़की से झाँक रहा है, कहीं गिर न पड़े !
पर उस एक क्षण के हिम-दर्शन ने हममें जाने क्या भर दिया था।
सारी खिन्नता, निराशा,थकावट-सब छू-मंतर हो गई।
हम सब आकुल हो उठे।
अभी ये बादल छँट जाएंगे फिर हिमालय हमारे सामने खड़ा होगा-निराव त......असीम सौंदर्यराशि हमारे सामने
अभी-अभी अपना घूँघट धीरे से खिसका देगी और..... और तब?
और तब?
सचमुच मेरा दिल बुरी तरह धड़क रहा था।
शुक्ल जी शांत थे, केवल मेरी ओर देख कर कभी-कभी मुस्करा देते थे,
जिसका अभिप्राय था,
‘इतने अधीर थे, कौसानी आया भी नहीं और मुँह लटका लिया।
अब समझे यहाँ का जादू !
’ डाकबँगले के खानसामे ने बताया कि ‘‘आप लोग बडे़ खुशकिस्मत है साहब !
14 टूरिस्ट आकर हफ्ते भर पड़े रहे, बर्फ नहीं दीखी।
आज तो आप के आते हीआसार खुलने के हो रहे है।’’
सामान रख दिया गया।
पर, सभी बिना चाय पिए सामने के बरामदे में बैठे रहे और एकटक सामने देखते रहे।
बादल धीरे-धीरे नीचे उतर रहे थे और एक-एक कर नए-नए शिखरों की हिम-रेखाएँ अनावत हो रही थीं।
और फिर सब खुल गया।
बाँईं ओर से शुरू हो के दाँयी ओर गहरे शून्य में धँसती जाती हुई हिम-शिखरोें की ऊबड़-खाबड़, रहस्यमयी, रोमाचंक श ंखला।
हमारे मन में उस समय क्या भावनाएँ उठ रही थीं यह अगर बता पाता तो यह खरोंच, यह पीर ही क्यों रह गई होती।
सिर्फ एक धुँधला-सा संवेदन इसका अवश्य था कि जैसे बर्फ़ की सिल के सामने खड़े होने पर मुँह पर ठंडी-ठंडी भाप लगती है,
वैसे ही हिमालय की शीतलता माथे को छू रही है और
सारे संघर्ष सारे अंतद्र्वंद्व, सारे ताप जैसे नष्ट हो रहे हैं।
क्यों पुराने साध कांे ने दैहिक, दैविक और भौतिक कष्टों को ताप कहा था और उसे शमित करने के लिए वे क्यों हिमालय जाते थे,
यह पहली बार मेरी समझ में आ रहा था।
और अकस्मात् एक दूसरा तथ्य मेरे मन के क्षितिज पर उदित हुआ। कितनी-कितनी पुरानी है यह हिमराशि ! जाने किस आदिम काल से यह शाश्वत अविनाशी हिम इन शिखरों पर जमा हुआ है।
कुछ विदेशियों ने इसलिए हिमालय की इस बर्फ को कहा है - चिरन्तन हिम (एटर्नल स्नो)।
सूरज ढल रहा था।
और सुदूर शिखरों पर दर्रे, ग्लेशियर, ढाल, घाटियांे का क्षीण आभास मिलने लगा था।
आतंकित मन से मैंने यह सोचा था कि पता नहीं इन पर कभी मनुष्य का चरण पड़ा भी हैया नहीं या अनंत काल से इन सूने बर्फ-ढँके दर्रों में सिर्फ बर्फ के अंधड़ हू-हू करते हुए बहतेरहे हंै।
सूरज डूबने लगा और धीरे-धीरे ग्लेशियरों में पिघली केसर बहने लगी।
बरफ कमल के लालफूलों में बदलने लगी, घाटियाँ गहरी पीली हो गईं।
अँधेरा होने लगा तो हम उठे और मुँह-हाथ धोने और चाय पीने लगे।
पर सब चुपचाप थे, गुमसुम, जैसे सबका कुछ छिन गया हो, या शायद सब को कुछ ऐसा मिल गया हो,
जिसे अंदर ही अंदर सहेजने में सब आत्मलीन होंया अपने में डूब गए हों।
थोड़ी देर में चाँद निकला और हम फिर बाहर निकले.........इस बार सब शांत था।
जैसे हिम सो रहा हो।
मैं थोड़ा अलग आरामकुर्सी खींच कर बैठ गया।
यह मेरा मन इतना कल्पनाहीन क्यों हो गया है?
इसी हिमालय को देख कर किसने-किसने क्या-क्या नहीं लिखा और यह मेरा मन है कि एक कविता तो दूर, एक पंक्ति, एक शब्द भी तो नहीं जागता।
पर कुछ नहीं, यह सब कितना छोटा लग रहा है, इस हिमसम्राट के समक्ष।
पर धीरे-धीरे लगा कि मन के अंदर भी बादल थे जो छँट रहे हैं।
कुछ ऐसा उभर रहा है, जो इन शिखरों की ही प्रकृति का है, जो इसी ऊँचाई पर उठने की चेष्टा कर रहा है ताकि इनसे इन्हीं के स्तर पर मिल सके।
लगा, यह हिमालय बड़े भाई की तरह ऊपर चढ़ गया है, और मुझे-छोटे भाई को-नीचे खड़ा हुआ, कुंठित और लज्जित देख कर थोड़ा उत्साहित भी कर रहा है, स्नेह-भरी चुनौती भी दे रहा है-‘‘हिम्मत है? ऊँचे उठोगे’?

- धर्मवीर भारती



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*जंगल के स्कूल का रिजल्ट*


हुआ यूँ कि जंगल के राजा शेर ने ऐलान कर दिया कि अब जंगल में कोई अनपढ़ नहीं रहेगा। हर पशु को अपना बच्चा स्कूल भेजना होगा। राजा साहब का स्कूल पढ़ा-लिखाकर सबको Certificate बँटेगा।

सब बच्चे चले स्कूल। हाथी का बच्चा भी आया, शेर का भी, बंदर का भी आया और मछली की बच्ची भी, खरगोश का बच्चा भी आया तो कछुआ की बिटिया भी, ऊँट का बच्चा भी और जिराफ का भी....!

FIRST UNIT TEST/EXAM हुआ तो हाथी का बच्चा फेल...

"किस Subject में फेल हो गया जी?" हाथी ने टीचर से पूछा !

"पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गया, तुम्हारा बच्चा !"

"अब क्या करें?"

"ट्यूशन दिलवाओ, कोचिंग में भेजो।"

*अब हाथी की जिन्दगी का एक ही मक़सद था कि हमारे बच्चे को पेड़ पर चढ़ने में Top कराना है !*

किसी तरह साल बीता। Final Result आया तो हाथी, ऊँट, जिराफ सबके बच्चे फेल । बंदर की औलाद first आयी ! Principal ने Stage पर बुलाकर मैडल दिया। बंदर ने उछल-उछल के कलाबाजियाँ दिखाकर, गुलाटियाँ मार कर खुशी का इजहार किया।

*उधर अपमानित महसूस कर रहे हाथी, ऊँट और जिराफ ने अपने-अपने बच्चे कूट दिये*। "नालायकों, इतने महँगे स्कूल में पढ़ाते हैं तुमको... ट्यूशन-कोचिंग सब लगवाए हैं, फिर भी आज तक तुम पेड़ पर चढ़ना नहीं सीखे ? *सीखो, बंदर के बच्चे से सीखो कुछ, पढ़ाई पर ध्यान दो !"*

फेल तो हालांकि मछली की बेटी भी हुई थी.... बेशक़ Swimming में First आयी थी पर बाकी subject में तो फेल ही थी। मास्टरनी बोली, *"आपकी बेटी के साथ attendance की भी problem है !"* मछली ने बेटी को आँखें दिखाई.... बेटी ने समझाने की कोशिश की कि, *"माँ, मेरा दम घुटता है इस स्कूल में... मुझे साँस ही नहीं आती। मुझे नहीं पढ़ना इस स्कूल में ! हमारा स्कूल तो तालाब में होना चाहिये ना?"*

"नहीं, ये राजा का स्कूल है, *तालाब वाले स्कूल में भेजकर मुझे अपनी नाक नहीं कटानी... समाज में कुछ इज्जत, Reputation है मेरी ! तुम्हें इसी स्कूल में पढ़ना है... बातों की जगह पढ़ाई पर ध्यान दो !*"

हाथी, ऊँट और जिराफ अपने-अपने Failure बच्चों को पीटते हुए ले जा रहे थे। रास्ते में बूढ़े बरगद ने पूछा, *"क्यों पीट रहे हो, बच्चों को?"*

जिराफ बोला, *"पेड़ पर चढ़ने में फेल हो गए, नालायक !"*

बूढ़ा बरगद ने सबसे पते की बात कही... *"पर इन्हें पेड़ पर चढ़ाना ही क्यों है ?"*

उसने कहा, *"हाथी तुम अपनी सूंड उठाओ और सबसे ऊँचा फल तोड़ लो... जिराफ तुम अपनी लंबी गर्दन उठाओ और सबसे ऊँचे पत्ते तोड़-तोड़ कर खाओ.... ऊँट भी गर्दन लंबी करके फल पत्ते खा लेगा.. हाथी के बच्चे को क्यों चढ़ाना चाहते हो पेड़ पर? मछली को तालाब में ही सीखने दो ना?"*

*"दुर्भाग्य से आज स्कूली शिक्षा का पूरा Curriculum और Syllabus सिर्फ बंदर के बच्चे के लिये ही Designed है... इस स्कूल में 35 बच्चों की क्लास में सिर्फ बंदर ही First आएगा... बाकी सबको फेल होना ही है !*

*"हाथी के बच्चे को पेड़ पर चढ़ाकर अपमानित मत करो... जबर्दस्ती उसके ऊपर फेलियर का ठप्पा मत लगाओ ! ठीक है, बंदर का उत्साहवर्धन करो पर शेष 34 बच्चों को नालायक, कामचोर, लापरवाह, Duffer, Failure घोषित मत करो !"*

*"मछली बेशक़ पेड़ पर न चढ़ पाये पर एक दिन वो पूरा समंदर नाप देगी !"*

*सारांश - अपने बच्चों की क्षमताओं व प्रतिभा की कद्र करें ! चाहे वह पढ़ाई, खेल, नाच, गाने, कला, अभिनय, BUSINESS, खेती, बागवानी, मकेनिकल, किसी भी क्षेत्र में हों, उन्हें उसी दिशा में अच्छा करने दें ! जरूरी नहीं कि सभी बच्चे पढ़ने में ही अव्वल हों ! उनमें केवल अच्छे संस्कार व नैतिक मूल्यों की जरूरत है, जिससे बच्चे गलत रास्ते नहीं चुनें !*

सभी अभिभावकों को सादर समर्पित
 

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Small Tornado at Visakhapatnam
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Published on 06-Mar-2012

Small tornado at visakhapatnam on 5th march 2012... Capture with my Nokia C5 I'm not selling the video or making any money from it.
 
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