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Plz Help Himabuj (Amit Tyagi) in Corona Fighting
लाहौल और स्पीति(Lahaul And Spiti)***Hindi Documentary
743,773 views
•Jan 30, 2021


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TAJ AGRO LIFE 4K


लाहौल और स्पीति(Lahaul And Spiti)***Hindi Documentary हिमाचल प्रदेश का जिला लाहौल स्पीति एक तरह से ठंडा रेगिस्तान है क्योंकि यहां बारिश कभी कभार ही बड़ी मुश्किल से होती है। लिहाजा लाहौल-स्पीति घूमने जाना अडवेंचरस अनुभव हो सकता है। यहां के पहाड़ और पर्वत श्रृंखला पूरी तरह से बंजर हैं और शायद ही कोई पेड़-पौधा आपको यहां नजर आएगा। यहां किसी भी मौसम में बर्फबारी देखने को मिलती है। ट्रेकिंग में दिलचस्पी है तब भी स्पीति वैली आपके लिए घूमने की बेहतरीन जगह हो सकती है। यहां पहाड़ों से नीचे उतरती नदियां भी तेज धार के साथ बहती हैं और यहां आसमां का रंग भी कुछ अलग ही नीला है जो बाकी जगहों से बिलकुल अलग है। ठंडी हवाओं के बीच आपको जगह-जगह बुद्धिस्ट प्रेयर फ्लैग्स उड़ते नजर आएंगे जो इस जगह के कल्चर का प्रतीक हैं। शहर की भीड़भाड़ से दूर कुछ दूर सुकून से बिताना चाहते हैं तो चले आइए लाहौल-स्पीति जहां आप इन जगहों की सैर कर सकते हैं...
 

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Plz Help Himabuj (Amit Tyagi) in Corona Fighting
Deadly bus ride to a remote Himalayan village | HRTC - Reckong peo to Hango
901,491 views
•May 24, 2021


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Himbus

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A detailed video covering all details of HRTC bus journey from Reckong peo to Hango. Reckong peo is the headquarter of Kinnaur district in Himachal Pradesh (India). Its located at a distance of approx. 240 kms from the state capital Shimla. Please watch the video in 4K for best experience and let us know your feedback in the comment section.
 

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साधारण से दिखने वाले महान भारतीय वैज्ञानिक—जो कभी नहीं गये स्कूल! (Dr. Rai Dahiya of Rajasthan) EP#1
580,060 views
•Apr 6, 2021


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Taj Agro Products


For a Bio Mass Engine main issues is Tar that stops engine Pistons as filtering Tar is main problem.
Main innovation is Tar Jacket which filters Gas Tar.
Gas Tar stops engine after some time.
After some (4) hours, Engine may stop.
To make it long life make a better filter.

साधारण से दिखने वाले महान भारतीय वैज्ञानिक—जो कभी नहीं गये स्कूल! (Dr. Rai Dahiya of Rajasthan) EP#1

कभी नहीं गये स्कूल; कचरे से चलने वाला इंजन बनाकर इस किसान ने खड़ा किया करोड़ों का कारोबार!

इस मशीन में एक किलो बायोवेस्ट डालने पर एक किलोवाट उर्जा उत्पन्न होती है, जिससे आप एक घंटे तक इंजन चला सकते हैं!

जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाते हैं, उस उम्र में रायसिंह खेतों में अपने माता-पिता की मदद करते थे। घर में छोटे-बड़े काम संभालने से लेकर, भेड़-बकरियां चराने तक, किसी भी काम में वे पीछे नहीं हटे। रायसिंह का बचपन भले ही कितनी भी ग़रीबी में बीता हो पर वे ज़िंदगी से कभी मायूस नहीं हुए। उन्होंने सिर्फ़ मेहनत की और आज उसी मेहनत का नतीजा है कि वे एक कंपनी के मालिक हैं और देश-विदेशों में उनकी पहचान एक आविष्कारक के तौर पर है।

राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले में थालडका गाँव के रहने वाले रायसिंह बताते हैं, “मैं कभी खुद तो स्कूल नहीं जा पाया लेकिन छोटे भाई-बहनों की पढ़ाई जारी रखवाई। मुझे पढ़ने का शौक था तो मैं अपने भाई से ही पढ़ लिया करता था। फिर खेतों में काम करते वक़्त टीलों पर मिट्टी से क, ख, ग… लिखता, गुणा-भाग करता। मैंने दसवीं के पेपर देने की भी सोची पर वो वक़्त ही ऐसा था कि कुछ हो नहीं पाया।”

रायसिंह को हर दिन कुछ न कुछ नया सीखने का चाव था। उनके गाँव में पहली बार जब बस चली तो उन्होंने मिट्टी से ही उस बस का मॉडल बना लिया। ऐसे ही जब उन्होंने पहली बार मोटरसाइकिल देखी तो उनके मन में सबसे पहले ख्याल आया कि यह कैसे बनी होगी?

इनोवेशन के प्रति उनकी दिलचस्पी मिट्टी के खिलौनों से शुरू होकर, धीरे-धीरे लोहे के औजार और फिर मशीनों की वर्कशॉप तक पहुँच गई।

साल 1979 में जब उनके यहाँ पहली बार इंजन आया तो उसे देखकर रायसिंह बहुत ही उत्साहित हो गए। अपने काम के साथ-साथ हर दिन वे कुछ वक़्त इंजन के अलग-अलग पार्ट्स के बारे में जानने में लगाते। लगभग एक साल में ही वे इंजन के एक्सपर्ट हो गए और न सिर्फ़ इंजन के बल्कि वे तो ट्रेक्टर के काम करने के लॉजिक और इंजन में आई कमी को दूर करने के तरीके भी खुद ही देखकर सीख गए।

“इसी तरह मैंने ट्रेक्टर भी ठीक करना सीख लिया। हमें अपने घर या खेत में किसी भी चीज़ की मरम्मत कराने के लिए बाहर से किसी मिस्त्री या मैकेनिक को बुलाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। मैं खुद ही ये सब काम देख लेता था। इस तरह जब गाँव में दूसरे लोगों ने देखा तो वे भी अपने इंजन और ट्रेक्टर सही करवाने के लिए मेरे पास आने लगे। मैं आपको इतना कह सकता हूँ कि मुझे इंजन की भाषा समझ में आती है। मैं इंजन की आवाज़ से ही पता लगा लेता हूँ कि उसके किस पार्ट में खराबी है,” रायसिंह ने हंसते हुए कहा।

रायसिंह न सिर्फ़ खेती और मशीनों से जुड़े काम करते थे बल्कि उन्होंने तो अपना घर बनाने के लिए ईंटें भी खुद ही बना ली थीं। वे बताते हैं कि उस वक़्त खेतों पर ही उन्होंने कच्चा घर बनाया हुआ था। बारिश के मौसम में उनके घर की छत टपकने लगती और उन्हें त्रिपाल लगाकर रहना पड़ता था।

ऐसे में, उन्होंने सोचा कि क्यों न वे अपने खेतों में फसल के बाद बचने वाले वेस्ट को यूँ ही जलाने की बजाय अपने घर के लिए ईंटें पकाने में इस्तेमाल करें।

उन्होंने आगे बताया, “एलपीजी इंजन बनाने के बाद मुझे लगा कि क्या हम लकड़ी जलने पर निकलने वाली गैस से इंजन चला सकते हैं? मैंने ऐसी मशीन बनाने पर काम किया जो कि लकड़ी के वेस्ट को (बायोमास) को गैस में तब्दील कर सकती है। इस मशीन को बनाने के बाद मुझे पता चला कि ऐसी मशीन को ‘गैसीफायर’ कहते हैं। मुझे एक सफल बायोमास गैसीफायर बनाने के लिए कई बार एक्सपेरिमेंट करने पड़े।”

इसके बाद उन्होंने डीज़ल इंजन को मॉडिफाई करके इस गैसीफायर के सहारे चलाने की कोशिश की। लेकिन इससे इंजन सिर्फ़ कुछ समय के लिए ही चल पा रहा था। मशीन पर और काम करने से रायसिंह को अंदाजा लगा कि इंजन गैस में मौजूद अशुद्धियों के चलते नहीं काम कर रहा है।

उन्होंने कई बार एक्सपेरिमेंट करके एक फाइनल गैसीफायर सिस्टम तैयार किया जिससे कि इंजन को बिना किसी परेशानी के 100-150 घंटे तक चलाया जा सकता है।

रायसिंह बताते हैं कि, उन्होंने 1 सितंबर 2001 को अपना पहला ‘बायोमास गैसीफायर’ से संचालित इंजन सफलतापूर्वक चलाया। शुरू में अपने गाँव में ही बायोमास गैसीफायर लगाया और लोगों को अपने घरों और खेतों से निकलने वाले बायो-वेस्ट को इसमें डालने के लिए कहा। इस बायो-वेस्ट को जलाने पर जितनी भी गैस उत्पन्न होती उससे हम खेतों में इंजन चला लिया करते थे।

उनका यह इनोवेशन जब उनके अपने गाँव में काफी सफल रहा तो उन्हें बाहर से लोगों ने सम्पर्क करना शुरू किया। इस तरह उनके इस इनोवेशन की चर्चा नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन तक पहुँच गई। नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन की टीम ने उनके बायोमास गैसीफायर को न सिर्फ सम्मानित किया बल्कि उसे और भी अच्छे स्तर पर मॉडिफाई करने के लिए रायसिंह की मदद भी की।

नेशनल अवॉर्ड मिलने के बाद उन्हें भारत के बाहर, जर्मनी, केन्या, घाना, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों से भी इस बायोमास गैसीफायर बनाने के मौके मिलने लगे। इतना ही नहीं, उन्हें राष्ट्रपति भवन में पूर्व राष्ट्रपति और वैज्ञानिक एपीजे अब्दुल कलाम के सामने भी अपने इस अविष्कार को दिखाने का मौका मिला।

“मुझे कई जगह से ऑर्डर मिलने लगे और फिर IIT, इंजीनियरिंग कॉलेज, ITI आदि के छात्र भी वर्कशॉप के लिए मेरे पास आने लगे। ऐसे में, गाँव में ही रहकर काम करना थोड़ा मुश्किल था।

उनकी बेटी डॉ. राज दहिया खुद को बहुत खुशनसीब मानती हैं कि उनके पिता का आविष्कार न सिर्फ़ समाज के लिए बल्कि पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है। वे कहती हैं, “पापा के साथ काम करके मुझे बहुत कुछ नया सीखने को मिला। आज मैं कोई साधारण नौकरी नहीं कर रही, मैं बहुत खुश हूँ कि पापा की वजह से मैं हमारे समाज, पर्यावरण और देश के लिए कुछ अच्छा कर पा रही हूँ।”
 
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Hikkim (Kaza, लाहौल और स्पीति), हिमाचल प्रदेश।— Located at 15500 feet, India **Hindi 4K Documentary
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•Jan 9, 2021


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Hikkim (Kaza, लाहौल और स्पीति), हिमाचल प्रदेश।— Located at 15500 feet, India **Hindi 4K Documentary

हिमाचल प्रदेश की स्पीति वैली के हिक्किम कस्बे में बना है यह ऑफिस हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले को खूबसूरत वादियों के लिए जाना जाता है। ...

At 4,400m above sea level in northern India’s remote Spiti Valley, the Hikkim post office is a vital connection to the outside world.

यह ऐसा पोस्ट ऑफिस जो आसपास के कई गांवों को दुनिया से जोड़ता है। लोग यहां चिट्ठियां डालने और पैसा जमा करने आते हैं। कई ऐसे सैलानी भी आते हैं जो इस पोस्ट ऑफिस से दूसरे देश संदेश भेजते हैं। रिंचेन शेरिंग पिछले 35 सालों से इस डाकखाने के पोस्ट मास्टर हैं। वो तब से ये पोस्ट ऑफिस चला रहे हैं, जब यह खुला था। यह साल में छह महीने बर्फबारी के कारण बंद रहता है। लाहौल-स्पीति को छोटा तिब्बत भी कहा जाता है। जो लोग शांत जगह या एडवेंचरस एक्टिविटीज पसंद करते हैं, उनके लिए हिमाचल प्रदेश यह जिला सबसे अच्छा विकल्प साबित होगा। यहां स्कीइंग के अलावा याक सफारी, ट्रैकिंक, रिवर राफ्टिंग और वाइल्ड लाइफ का लुत्फ भी उठाया जा सकता है। यहां पहुंचने के लिए शिमला सबसे करीबी रेलवे स्टेशन है जो 160 किलोमीटर की दूरी पर है और सबसे करीबी एयरपोर्ट कुल्लू है जो करीब 80 किलोमीटर है।

लाहौल और स्पीति पहले दो अलग जिले थे, जिसे बाद में मिलाकर एक जिला बनाया गया। यहां की वादियां आपको पहाड़ी रेगिस्तान का अहसास कराती हैं। बौद्ध अनुयायियों के कई मठ देखने को मिलेंगे। ताबो नाम का बौद्ध मठ 1000 साल से भी ज्यादा पुराना होने की वजह से तो जाना ही जाता है। बडी संख्या में बौद्ध श्रद्धालु और पर्यटक इसे देखने आते हैं। ये जिस गांव में है वो एक कटोरेनुमा आकृति की घाटी में बसा है। इस मठ में नौ मंदिर हैं और 4 स्तूप हैं। इसे यूनेस्को ने वर्ल्ड हेरिटेज में शामिल किया है। यह जगह कई फेस्टिवल के लिए भी जानी जाती है जैसे पौड़ी फेयर, शेशू फेयर, ट्राइबल फेयर, गोची फेयर, फुगली फेयर। ताल लेक, सूरजताल लेक और दशिर लेक आपको यहां दोबारा आने के लिए प्रेरित करेगी।

Hikkim (Kaza, लाहौल और स्पीति), काजा हिमाचल प्रदेश के कोने में स्पीति नदी के मैदानों पर एक शांत जगह है, जो पर्यटकों को अपनी आकर्षण से बेहद प्रभावित करती है। बर्फ से ढंके राजसी पहाड़ों, छिटपुट बस्तियों के साथ बहती नदियों, धाराओं और सुरम्य बंजर परिदृश्यों से घिरा काजा एक सपने के सामान है। आपको बता दें कि काजा को दो भागों में विभाजित किया गया है जिसमें से एक को पुराने काजा और दूसरे को नए काजा कहा जाता है। प्रत्येक में क्रमशः सरकारी कार्यालय और राजा का महल है।

छोटे से गांव हिक्किम में है यह पोस्ट ऑफिस
इसी स्पीति घाटी में बंजर पहाड़ों के बीच स्थित है छोटा सा गांव हिक्किम। इसी गांव में है दुनिया का सबसे ऊंचा डाक खाना। ये पोस्ट ऑफिस आस-पास के कई गांवों के लोगों को बाकि दुनिया से जोड़ता है। लोग यहां अपनी चिट्ठियां डालने और पैसे जमा कराने आते हैं।

स्पीति घाटी धरती पर सबसे ऊंचे ठिकानों में से है जहां इंसान आबाद है। यहां बंजर पहाड़ हैं। बेहद खतरनाक पहाड़ी दर्रे हैं और बलखाती नदियां हैं। करीब पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर पहुंचकर आपको महसूस होगा कि आप पहाड़ी रेगिस्तान में पहुंच गए हैं। किसी दूसरी दुनिया में आ गए हैं।

क्या आप को पता है कि दुनिया का सबसे ऊंचा पोस्ट ऑफ़िस !!

मठ, गोम्पा और अन्य ऐतिहासिक स्थल इस शहर के पुराने जादुई आकर्षण है। काजा आज आधुनिकता और अनूठी प्राचीन संस्कृति का अद्भुत मिश्रण है जो अपने रहस्य से किसी को भी मुग्ध कर देगा। काजा अपने रंगीन त्योहारों और शहर से 14 किमी दूर एक साइड घाटी में प्राचीन शाक्य तंगयूड मठ के लिए भी प्रसिद्ध है। अगर आप काजा और इसके पास के अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में जानना चाहते हैं तो हमारे इस लेख को जरुर पढ़े, यहाँ हम आपको काजा के बारे में विस्तार से जानकारी देने जा रहें हैं।

काजा स्पीति नदी के पास हिमाचल प्रदेश की एक शांत जगह है जो भगदड़ वाले क्षेत्रों से बिलकुल अलग है। यहाँ के बर्फ से ढंके पहाड़, बुदबुदाती नदियाँऔर हरे-भरे मैदानों के साथ सुरम्य बंजर परिदृश्य बैकपैकर्स के लिए एक स्वप्निल गंतव्य है। काजा की यात्रा करने वाले पर्यटकों को यह जगह सपने के सामान लगती है, जो कोई भी एक बार यहाँ आता है वो इस जगह को भूल नहीं पाता है।

हिमाचल प्रदेश के एक छोटे से शहर में स्थित होने की वजह से काजा खाने के विकल्प सीमित है। हालाँकि, आप शहर में और उसके आस-पास भारतीय और तिब्बती व्यंजन प्राप्त कर सकते हैं। काजा के सबसे प्रसिद्ध व्यंजनों में ग्रेवी के साथ ताजा मटर और आलू शामिल हैं। थुकपा भी यहाँ का एक प्रमुख व्यंजन है जो सॉस के साथ नूडल और उबली हुई सब्जियों के साथ सूप बनाया जाता है। पर्यटक यहाँ पर विभिन्न प्रकार के मोमोज का स्वाद भी ले सकते हैं। इस शहर में तिब्बती रोटी, जौ या अन्य बाजरा के आटे से बनी रोटी भी उपलब्ध है जिसको मक्खन, आमलेट या जैम के साथ खाया जाता है।

ठंड के रेगिस्तान के रूप से प्रसिद्ध काजा का तापमान सर्दियों के दौरान काफी गिर जाता है और यहाँ बर्फ जमने लगी है। यहाँ के प्रमुख प्रवेश मार्ग रोहतांग दर्रा और कुंजम दर्रा, दोनों ही भारी बर्फबारी के कारण अक्टूबर के अंत से जून तक बंद रहते हैं। यहाँ पर -37 डिग्री के औसत के साथ जनवरी वर्ष का सबसे ठंडा महीना दर्ज किया गया है। काजा को भारत की सबसे ठंडी जगहों में से एक के रूप में जाना जाता है। गर्मियों के दौरान काजा का मौसम काफी सुखद होता है। अगर आप काजा की यात्रा करना चाहते हैं तो यहाँ की सुंदरता को महसूस करने के लिए मई से अक्टूबर तक का महीना एक आदर्श समय होगा।
 

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उत्तराखंड में क्यों खाली हो गए हजारों गांव ?—[Uttarakhand Villages Migration]—*****Hindi Documentary
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•Jun 7, 2021


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उत्तराखंड में क्यों खाली हो गए हजारों गांव ?—[Uttarakhand Villages Migration]—*****Hindi Documentary


जब से उत्तराखंड राज्य अस्तित्व में आया है, तब से निरंतर पलायन बढ़ता ही जा रहा है. पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश के हजारों गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं.

उत्तराखंड में बोंडुल नाम का ऐसा गांव है, जहां से लोग पलायन कर चुके हैं. इस गांव में आज भी घर बने हुए हैं, लेकिन यहां कोई रहता नहीं है और घरों में ताले लगे हैं.

#UttarakhandVillagesMigration #उत्तराखंडमेंपलायन #पलायन #migration

Over 5 lakh people have migrated out of Uttarakhand in last 10 years, 734 ghost villages in the state, reveals RTI. The RTI also says that 3946 villages are ones from where people have migrated 'permanently' leaving land and homes which implies these villages fit the definition of 'Ghost Village'.

अपने पर्वतीय भूगोल और सांस्कृतिक पहचान की बदौलत उत्तराखंड को अलग राज्य बना था. लेकिन आज ये पहचान खतरे में है. गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं और बड़े पैमाने पर लोग पलायन कर मैदानी इलाकों का रुख कर चुके हैं.

सामाजिक स्तर पर पलायन ने और राजनैतिक स्तर पर आबादी के लिहाज से हुए परिसीमन ने उत्तराखंड से उसका पर्वतीय स्वरूप एक तरह से छीन लिया है. 70 सीटों वाली राज्य विधानसभा में राज्य के नौ पर्वतीय जिलों को जितनी सीटें आवंटित हैं उससे कुछ ज्यादा सीटें राज्य के चार मैदानी जिलों के पास हैं. राज्य का पर्वतीय भूगोल सिकुड़ चुका है. 2011 के जनसंख्या आंकड़े बताते हैं कि राज्य के करीब 17 हजार गांवों में से एक हजार से ज्यादा गांव पूरी तरह खाली हो चुके हैं. 400 गांवों में दस से कम की आबादी रह गई है. 2013 की भीषण प्राकृतिक आपदा ने तो इस प्रक्रिया को और तेज कर दिया है और पिछले तीन साल में और गांव खाली हुए हैं. हाल के अनुमान ये हैं कि ऐसे गांवों की संख्या साढ़े तीन हजार पहुंच चुकी है, जहां बहुत कम लोग रह गए हैं या वे बिल्कुल खाली हो गए हैं.

पलायन की तीव्र रफ्तार का अंदाजा इसी से लगता है कि आज जब राज्य के चौथे विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं तो ऐसे में कई पहाड़ी गांवों में मतदाता ही नहीं हैं. एक मीडिया खबर के मुताबिक कुमाऊं के चंपावत जिले के 37 गांवों में कोई युवा वोटर ही नहीं है. सारे वोटर 60 साल की उम्र के ऊपर के हैं. और ये बुजुर्ग आबादी भी गिनी चुनी है. एक गांव में बामुश्किल 60-70 की आबादी रह गई है. अनुमान है कि पिछले 16 वर्षों में करीब 32 लाख लोगों ने अपना मूल निवास छोड़ा है. युवा वोटरों की किल्लत से जूझ रहे गांवों के बनिस्पत शहरों में युवा वोटरों की संख्या बढ़ती जा रही है. इस समय करीब 75 लाख मतदाताओं में से 56 लाख ऐसे वोटर हैं जिनकी उम्र 50 साल से कम है. इनमें से करीब 21 लाख लोग 20-29 के आयु वर्ग में हैं और करीब 18 लाख 30-39 के वर्ग में हैं.

साफ है कि युवा आबादी गांवों से कमोबेश निकल चुकी है. बेहतर शिक्षा, बेहतर रोजगार और बेहतर जीवन परिस्थितियों के लिए उनका शहरी और साधन संपन्न इलाकों की ओर रुख करना लाजिमी है. पहाड़ों में फिर कौन रहेगा. गांव तेजी से खंडहर बन रहे हैं, रही सही खेती टूट और बिखर रही है. कुछ प्राकृतिक विपदाएं, बुवाई और जुताई के संकट, कुछ संसाधनों का अभाव, कुछ माली हालत, कुछ जंगली सुअरों और बंदरों के उत्पात और कुछ शासकीय अनदेखियों और लापरवाहियों ने ये नौबत ला दी है. पहाड़ों में जैसे तैसे जीवन काट रहे लोग अपनी नई पीढ़ी को किसी कीमत पर वहां नहीं रखना चाहते. चाहे वे किसान हों या साधारण कामगार या फिर सरकारी कर्मचारी जैसे शिक्षक डॉक्टर या किसी अन्य विभाग के कर्मचारी.

पहाड़ी जीवन को गति देने के लिए, उसमें नई ऊर्जा भरने के लिए और गांवों को फिर से आबाद करने के लिए होना तो ये चाहिए था कि सरकारें बहुत आपात स्तर पर इस पलायन को रोकती. दुर्गम इलाकों को तमाम बुनियादी सुविधाओं से लैस कर कुछ तो सुगम बनाती. खेत हैं लेकिन बीज नहीं, हल, बैल, पशुधन सब गायब. स्कूल हैं तो भवन नहीं, भवन हैं तो टीचर कम, पाइपलाइनें हैं तो पानी कम, बिजली के खंभे हैं तो बिजली नहीं. अस्पताल हैं तो दवाएं उपकरण और डॉक्टरों का टोटा. ये किल्लत भी जैसे पहाड़ की नियति बन गई है. ऐसा नहीं है कि उत्तराखंड में पलायन इन 16 वर्षों की ही समस्या है. काफी पहले से लोग रोजीरोटी के लिए मैदानों का रुख करते रहे हैं. एक लाख सर्विस मतदाता इस राज्य में है. यानी जो सेना, अर्धसैनिक बल आदि में कार्यरत है. ये परंपरा बहुत पहले से रही है. युवा भी अपने अपने वक्तों में बाहर ही निकले हैं. लेकिन अगर वे इतने बड़े पैमाने पर गांवों के परिदृश्य से गायब हुए हैं तो ये सोचने वाली बात है कि क्या वे सभी उस सुंदर बेहतर जीवन को हासिल कर पाएं होंगे जिसकी कामना में वे अपने घरों से मैदानों की ओर निकले होंगे. इस मूवमेंट का, उसके नतीजों का अध्ययन किया जाना जरूरी है.

ये दलील बेतुकी है पहाड़ी इलाकों में सुविधाएं पहुंचाना दुष्कर काम है. उत्तराखंड के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश का उदाहरण हमारे सामने है. उसने उन्हीं चीजों में अपनी पहचान और समृद्धि का निर्माण किया है जिनका संबंध विशुद्ध पर्वतीयता से है. जैसे कृषि, बागवानी, पनबिजली, पर्यटन, कला आदि. उत्तराखंड में क्या ये संभव नहीं हो सकता था? आज अगर बूढ़े अकेले छूट गए हैं या गांव भुतहा हो चले हैं तो इसकी जिम्मेदारी किस पर आती है. क्या उन जगहों को छोड़ कर जाने वालों पर या उन लोगों पर जो इस भूगोल के शासकीय नियंता और नीति निर्धारक चुने गए हैं. महात्मा गांधी ने कहा था, भारत की आत्मा गांवों में बसती है. लेकिन जब गांव ही नहीं रहेंगे तो ये आत्मा बियाबान में ही भटकेगी.
 

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सौ सालों से बहता पानी || ये पानी कभी नहीं सूखता || Drinking Water Source At My Home || Namaste Pahad
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•May 17, 2021


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Kinjani
किन्जनी
Uttarakhand 246473
 
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